RV cg news राजू वासवानी रायपुर छत्तीसगढ़ मो.9827916611
राज विक्रम की कलम से✍️
मैं कौन हूँ ?
मैं सिंधु नदी की पावन गोद में जन्मा, उस सनातन परंपरा का वंशज हूँ जिसने मानव सभ्यता के स्वर्णिम अध्यायों को आकार दिया ।।
मैं उस गौरवशाली सिंधु भूमि की संतान हूँ , जहाँ से विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक — सिंधु घाटी सभ्यता — ने जन्म लिया और सम्पूर्ण मानवता को संस्कृति, ज्ञान और वैभव का मार्ग दिखाया ।।
मैं एक सनातनी राजपूत था — धर्म का रक्षक , संस्कृति का संवाहक और राष्ट्र की सीमाओं का अडिग प्रहरी ।। मेरे हाथों में शस्त्र थे, हृदय में धर्म था और मस्तक पर स्वाभिमान का तेज ।। मैं रणभूमि में सिंह की भाँति गर्जना करता था और अन्याय के विरुद्ध वज्र बनकर खड़ा रहता था कालचक्र घूमता रहा ।। युग बदले, परिस्थितियाँ बदलीं ।। धीरे-धीरे मेरे हाथों से शस्त्र छूट गए और व्यापार ने मेरा नया कर्म बनकर स्थान ले लिया। रणभूमि की धूल पीछे छूट गई और बाजार की चहल-पहल मेरे जीवन का हिस्सा बन गई ।। एक योद्धा की पहचान व्यापारी के रूप में परिवर्तित होने लगी ।।
समय की धारा और आगे बढ़ी। सामाजिक संबंधों के स्वरूप बदले ।। मैं हिन्दू राजपूत से हिन्दू वैश्य कहलाने लगा ।। शस्त्र और शास्त्र दोनों जीवन से दूर होते गए , जबकि व्यापार और संपन्नता मेरे अस्तित्व का केंद्र बन गए फिर एक ऐसा दौर आया जब मेरी पहचान और संकुचित हो गई। मैं केवल ‘हिन्दू सिंधी’ बनकर रह गया। विवाह, संबंध और सामाजिक दायरा सीमित होता चला गया ।। जो समाज कभी विशाल क्षितिजों पर विचरण करता था , वह धीरे-धीरे अपनी ही सीमाओं में बंधने लगा ।।
समय ने एक और करवट ली ।। समाज उपसमाजों , बिरादरियों और क्षेत्रों में विभाजित होने लगा। कोई लाड़काणा वाला कहलाया, कोई कंधकोठी, कोई सखरवासी , कोई शिकारपुरी , एक ही वटवृक्ष की शाखाएँ स्वयं को अलग-अलग वृक्ष समझने लगीं ।। एकता का विशाल प्रवाह अनेक छोटी धाराओं में बंटता चला गया ।।
फिर आर्थिक विभाजन ने जन्म लिया ।। समाज अमीर , मध्यम और गरीब वर्गों में विभाजित हो गया ।। सामाजिक दूरियाँ बढ़ीं और सामूहिक चेतना क्षीण होती गई ।।
इसके बाद आध्यात्मिक विभाजन का दौर आया। कोई राधास्वामी बना , कोई आनंदपुरी , कोई सचो सतराम का अनुयायी , कोई जय समाधि , कोई सतनाम साक्षी ।। श्रद्धा के मार्ग अनेक हुए, परंतु समाज को जोड़ने वाला सूत्र दुर्बल होता गया ।।
और मैं बंटता ही चला गया...
कभी मैं विशाल रियासतों का स्वामी था ।। मेरे दरबारों में न्याय की गूंज सुनाई देती थी ।। मेरी पंचायतें समाज को दिशा देती थीं ।। आज वही मैं छोटी-छोटी सीमाओं , मोहल्लों और संकीर्ण दायरों में सिमट गया हूँ ।।
कभी मैं शास्त्र का ज्ञाता और शस्त्र का साधक था ।। आज अपनी गौरवशाली विरासत को स्मरण करने के स्थान पर केवल उत्सवों और औपचारिक परंपराओं तक सीमित होता जा रहा हूँ ।। तब मेरा अंतर्मन मुझसे प्रश्न करता है ।।
मैं क्या था? और आज क्या बन गया हूँ ?
मैं बिरादरियों में बंटा, गुरुओं में बंटा , पंचायतों में बंटा , आर्थिक वर्गों में बंटा और अंततः अपनी मूल पहचान से ही दूर होता चला गया ।।
आज मेरे अंतर्मन से एक प्रचंड पुकार उठती है—
मैं कौन हूँ ?
मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है?
मेरा कर्तव्य क्या है?
और मुझे किस महान उद्देश्य के लिए जीवन जीना है?
जब मेरा जन्म हुआ था , तब मैं अथाह समुद्र के समान विशाल था ।। विश्व के अनेक राजवंशों और सभ्यताओं से मेरे संबंध थे ।। मैं सिंधु नरेशों की गौरवशाली परंपरा का प्रतिनिधि था ।। मेरी पहचान किसी जाति , बिरादरी या सीमित समूह तक बंधी नहीं थी; मैं एक महान सभ्यता , अद्वितीय संस्कृति और अनुपम वैभव का प्रतीक था ।। किन्तु आज जब मैं स्वयं को देखता हूँ , तो ऐसा प्रतीत होता है मानो वह अथाह समुद्र सिमटकर एक सूखे कुएँ में परिवर्तित हो गया हो ।।
फिर भी इतिहास का अटल सत्य है—
जो समाज अपनी जड़ों को पहचान लेता है, अपने गौरव को स्मरण कर लेता है और अपनी एकता को पुनः स्थापित कर लेता है, उसे पुनर्जीवित होने से कोई शक्ति नहीं रोक सकती ।।
मैं सिंधु की संतान हूँ ।।
मेरा अस्तित्व किसी बिरादरी, किसी धड़े, किसी पंचायत अथवा किसी उपाधि तक सीमित नहीं है ।।
मेरा परिचय मेरी महान सभ्यता है ।।
मेरा परिचय मेरी संस्कृति है ।।
मेरा परिचय मेरा सनातन धर्म है ।।
मेरा परिचय मेरा स्वाभिमान है ।।
और जब तक यह स्वाभिमान जीवित है , तब तक मेरी पहचान , मेरी विरासत और मेरा अस्तित्व अमर है ।।
मैं सिंधु की संतान हूँ ।।
मैं सनातन की ज्योति हूँ ।।
मैं इतिहास की गौरवगाथा हूँ ।।
और मैं पुनः जागरण की प्रतीक्षा नहीं , उसका संकल्प हूँ ।।
राज विक्रम ✍️